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फूल और बादल

फूल बिना पानी के खिलने लगे हैं,

लगता है बादलों से मिलने लगे हैं।
बादलों से यह प्यार पल भर का है,
गर्मी के सूखे दिन भूलने लगे हैं।

पहाड़ों से आती नदियों की थकावट,
यूं रास्तों में पत्थरों की रुकावट।
यह संघर्ष फूल को दिखता नहीं,
शरद रात फूलों के आगे झुकता नहीं।

छोड़ देता उन्हें मुरझाने के लिए,
खुद खो जाता ओस की बूंद में जाने के लिए।

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